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कविता: मुहोब्बत

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मुहोब्बत

उसने पूछा-

मुहोब्बत क्या है

मैंने कहा 'आग 

और दिल?

'चूल्हा है

वो मुस्कराई और बोली-

तो क्या पकाते हो इस पर?

'रिश्ते और जज्बात'

ये चूल्हा जलता कैसे है?

'बातो से मुलाकातों से'

उसने शरारती लहजे में पूछा-

अच्छा तो मैं क्या हूं?

मैंने कहा- "तुम,

रोशनी हो और तपिश भी"

वो मुस्कराई और शांत हो गई।

उसने नहीं पूछा धुआं क्या है?

वो अब भी नहीं जानती,

मुहोब्बात क्या है ।

🖊️ अर्पित सचान



टिप्पणियाँ

Shilpi thakur ने कहा…
Very nice
Saumya sengar ने कहा…
👍👍👍👍